लेह-लद्दाख


लेह-लद्दाख भारत का एक केन्द्र शासित प्रदेश है, जो उत्तर में काराकोरम पर्वत और दक्षिण में हिमालय पर्वत के बीच में है। एक वास्तविक परिदृश्य, और जम्मू और कश्मीर में श्योक, ज़ांस्कर और सिंधु नदियों के क्रिस्टल पानी से घिरा, लद्दाख का मुख्य शहर है क्षेत्र, दुनिया के सबसे ठंडे रेगिस्तानों में से एक है।

 लद्दाख का क्षेत्रफल 97,776 वर्ग किलोमीटर है। इसके उत्तर में चीन तथा पूर्व में तिब्बत की सीमाएँ हैं। समुद्र तल से 11,000 फुट की ऊंचाई पर स्थित, लेह शहर साहसिक खेलों का एक अड्डा है। इसके ऊबड़-खाबड़ इलाक़े और ख़ुशहाल नदियाँ ट्रेकिंग, रिवर राफ्टिंग, कैम्पिंग, माउंटेन क्लाइम्बिंग और बाइकिंग जैसी गतिविधियों के लिए पके अवसर प्रदान करती हैं।

 सर्दियों के महीनों के दृष्टिकोण के रूप में, शहर बर्फ के एक कंबल में ढंका हुआ है, जिससे यह शीतकालीन खेलों के लिए एक पैराडाइसियल सेटिंग है। प्रसिद्ध चडार ट्रेक, 66 किमी दूर चिलिंग गांव से शुरू होता है, और ज्यादातर ज़ांस्कर नदी के जमे हुए क्षेत्र को कवर करता है। पूरे साहसिक कार्य के दौरान,


लेह तीन भव्य ऊँची-ऊँची झीलों, त्सो मोरीरी, त्सो कार और पैंगोंग त्सो से घिरा हुआ है जो जमीन में एम्बेडेड नीलम की तरह दिखते हैं। एक प्राकृतिक आश्चर्य जो पर्यटकों को खौफ में छोड़ देता है वह है शहर का बाहरी इलाका। यह गुरुत्वाकर्षण को धता बताने के लिए कहा जाता है क्योंकि यह वाहनों को ऊपर की ओर खींचता है।

 लेह एक प्रमुख बौद्ध केंद्र है और कई महत्वपूर्ण मठों के साथ स्थित है। पर्यटक एक मठ मार्ग पर स्थापित कर सकते हैं और ध्यान और अन्य चिकित्सीय और आध्यात्मिक गतिविधियों में लिप्त रहते हुए दीवारों पर आसन्न विभिन्न चित्रों में जीवित आ सकते हैं।

लेह लद्दाख राज्य की पूर्ववर्ती राजधानी थी और एक विरासत का दावा करती है जो इसके समृद्ध इतिहास को दर्शाती है। 17 वीं शताब्दी के लेह पैलेस के साथ, जो मध्ययुगीन तिब्बती वास्तुकला का एक बड़ा उदाहरण है, इस शहर में विरासत स्थलों का एक आकर्षक आनंद मिलता है जो इस दिन तक लंबा है।

 लेह की संस्कृति का अनुभव करने के सर्वोत्तम तरीकों में से एक होमस्टे में जांचना है जहां मेजबान लद्दाखी संस्कृति में मेहमानों को डुबोने में कोई कसर नहीं छोड़ेगा। खुबानी, सेब, और अन्य फलों और सब्जियों: जो अपने बागों और बाजारों में पाई जा सकती हैं, का एक और शानदार तरीका यह है कि यह क्षेत्र अपनी ताजा उपज के माध्यम से है।

लेह लदाख  का इतिहास

लद्दाख में कई स्थानों पर मिले शिलालेखों से पता चलता है कि यह स्थान नव-पाषाणकाल से स्थापित है। लद्दाख के प्राचीन निवासी मोन और दार्द लोगों का वर्णन हेरोडोट्स, नोर्चुस, मेगस्थनीज, प्लीनी, टॉलमी और नेपाली पुराणों ने भी किया है। पहली शताब्दी के आसपास लद्दाख कुषाण राज्य का हिस्सा था। बौद्ध धर्म दूसरी शताब्दी में कश्मीर से लद्दाख में फैला। उस समय पूर्वी लद्दाख और पश्चिमी तिब्बत में परम्परागत बोन धर्म था। सातवीं शताब्दी में बौद्ध यात्री ह्वेनसांग ने भी इस क्षेत्र का वर्णन किया है।

आठवीं शताब्दी में लद्दाख पूर्व से तिब्बती प्रभाव और मध्य एशिया से चीनी प्रभाव के टकराव का केन्द्र बन गया।  सन 842 में एक तिब्बती शाही प्रतिनिधि न्यिमागोन ने तिब्बती साम्राज्य के विघटन के बाद लद्दाख को कब्जे में कर लिया और पृथक लद्दाखी राजवंश की स्थापना की। इस दौरान लद्दाख में मुख्यतः तिब्बती जनसंख्या का आगमन हुआ। राजवंश ने उत्तर-पश्चिम भारत खासकर कश्मीर से धार्मिक विचारों और बौद्ध धर्म का खूब प्रचार किया। इसके अलावा तिब्बत से आये लोगों ने भी बौद्ध धर्म को फैलाया।

13वीं शताब्दी में जब दक्षिण एशिया में इस्लामी प्रभाव बढ रहा था, तो लद्दाख ने धार्मिक मामलों में तिब्बत से मार्गदर्शन लिया। लगभग दो शताब्दियों बाद सन 1600 तक ऐसा ही रहा। उसके बाद पडोसी मुस्लिम राज्यों के हमलों से यहां आंशिक धर्मान्तरण हुआ।

राजा ल्हाचेन भगान ने लद्दाख को पुनर्संगठित और शक्तिशाली बनाया व नामग्याल वंश की नींव डाली जो वंश आज तक जीवित है। नामग्याल राजाओं ने अधिकतर मध्य एशियाई हमलावरों को खदेडा और अपने राज्य को कुछ समय के लिये नेपाल तक भी बढा लिया। हमलावरों ने क्षेत्र को धर्मान्तरित करने की खूब कोशिश की और बौद्ध कलाकृतियों को तोडा फोडा। सत्रहवीं शताब्दी के आरम्भ में कलाकृतियों का पुनर्निर्माण हुआ और राज्य को जांस्कर व स्पीति में फैलाया। फिर भी, मुगलों के हाथों हारने के बावजूद भी लद्दाख ने अपनी स्वतन्त्रता बरकरार रखी। मुगल पहले ही कश्मीर व बाल्टिस्तान पर कब्जा कर चुके थे।

सत्रहवीं शताब्दी के आखिर में लद्दाख ने किसी कारण से तिब्बत की लडाई में भूटान का पक्ष लिया। नतीजा यह हुआ कि तिब्बत ने लद्दाख पर भी आक्रमण कर दिया। यह घटना 1679-1684 का तिब्बत-लद्दाख-मुगल युद्ध कही जाती है। तब कश्मीर ने इस शर्त पर लद्दाख का साथ दिया कि लेह में एक मस्जिद बनाई जाये और लद्दाखी राजा इस्लाम कुबूल कर ले।

1684 में तिंगमोसगंज की सन्धि हुई जिससे तिब्बत और लद्दाख का युद्ध समाप्त हो गया। 1834 में डोगरा राजा गुलाब सिंह के जनरल जोरावर सिंह ने लद्दाख पर आक्रमण किया और उसे जीत लिया। 1842 में एक विद्रोह हुआ जिसे कुचल दिया गया तथा लद्दाख को जम्मू कश्मीर के डोगरा राज्य में विलीन कर लिया गया। नामग्याल परिवार को स्टोक की नाममात्र की जागीर दे दी गई। 1850 के दशक में लद्दाख में यूरोपीय प्रभाव बढा और फिर बढता ही गया। भूगोलवेत्ता, खोजी और पर्यटक लद्दाख आने शुरू हो गये। 1885 में लेह मोरावियन चर्च के एक मिशन का मुख्यालय बन गया।

1947 में भारत विभाजन के समय डोगरा राजा हरिसिंह ने जम्मू कश्मीर को भारत में विलय की मंजूरी दे दी। पाकिस्तानी घुसपैठी लद्दाख पहुंचे और उन्हें भगाने के लिये सैनिक अभियान चलाना पडा। युद्ध के समय सेना ने सोनमर्ग से जोजीला दर्री पर टैंकों की सहायता से कब्जा किये रखा। सेना आगे बढी और द्रास, कारगिल व लद्दाख को घुसपैठियों से आजाद करा लिया गया।

1984 से लद्दाख के उत्तर-पूर्व सिरे पर स्थित सियाचिन ग्लेशियर भारत और पाकिस्तान के बीच विवाद की एक और वजह बन गया। यह विश्व का सबसे ऊंचा युद्धक्षेत्र है। यहां 1972 में हुए शिमला समझौते में पॉइण्ट 9842 से आगे सीमा निर्धारित नहीं की गई थी। यहां दोनों देशों में साल्टोरो रिज पर कब्जा करने की होड रहती है। कुछ सामरिक महत्व के स्थानों पर दोनों देशों ने नियन्त्रण कर रखा है, फिर भी भारत इस मामले में फायदे में है 1979 में लद्दाख को कारगिल व लेह जिलों में बांटा गया।

1989 में बौद्धों और मुसलमानों के बीच दंगे हुए। 1990 के ही दशक में लद्दाख को कश्मीरी शासन से छुटकारे के लिये लद्दाख ऑटोनॉमस हिल डेवलपमेण्ट काउंसिल का गठन हुआ और अंततः 5 अगस्त 2019 को यह भारत का नौवाँ केन्द्र शासित प्रदेश बन गया।

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