स्वतंत्रता सेनानी अक्कम्मा चेरियन (1909 -1982)

अक्कम्मा चेरियन वह स्वतंत्रता सेनानी हैं, जिनके बारे में केरल को छोड़कर अन्य राज्यों के अधिकांश लोगों को अधिक जानकारी नहीं है।

जन्म14 फरवरी 1909
कांजिरापल्ली, त्रवनकोर
मृत्यु
5 मई 1982
तिरुवनन्तपुरम, केरेला, भारत
राष्ट्रीयताभारतीय
राजनैतिक पार्टी
त्रावणकोर राज्य कांग्रेस
जीवनसाथीवी वी वार्की
माता-पिताथॉममन चेरियन और अन्नाम्मा

स्वतंत्रता सेनानी अक्कम्मा चेरियन आरम्भिक जीवन और शिक्षा

आज आपका परिचय केरल की बहादुर अकम्मा चेरियन से करा रहा हूं। अकम्मा का जन्म 1909 में कांजीरपल्ली, त्रावणकोर में थोमन चेरियन और अनम्मा करिप्पारंबिल के घर हुआ था। आप अपने परिवार की दूसरी बेटी है।

आप ने सेंट टेरेसा कॉलेज, एर्नाकुलम से इतिहास में BA करने के बाद ,1931 में अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद सेंट मैरी स्कूल, एडक्कारा में एक शिक्षक के रूप में काम करना शुरू कर दिया।

प्रतिभाशाली अकम्मा को करियर में तेजी से सफलता मिली और वह स्कूल की प्रधानाध्यापिका बन गईं।  इस संस्थान में लगभग छह वर्षों तक काम किया  और इस दौरान उन्होंने ट्राई ट्रेनिंग कॉलेज से एलटी की डिग्री भी हासिल की ।

स्वतंत्रता सेनानी अक्कम्मा चेरियन

अक्कम्मा चेरियन स्वतंत्रता संग्राम में भागीदारी

आप के मन में अपनी मातृभूमि की गुलामी को लेकर बैचैनी रहती थी। भारत को एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में देखने की लालसा लिए हुए एक दिन आप अपनी प्रतिष्ठित नौकरी छोड़ दी और 1938 में स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हो गईं। आप ‘त्रावणकोर राज्य कांग्रेस’ की एक सक्रिय सदस्य बन गईं।

लेकिन त्रावणकोर के दीवान ने आंदोलन को दबाने का फैसला किया और अगस्त 1938 में उसने मनमाने तरीके से राज्य कांग्रेस पर प्रतिबंध लगा दिया।

इन दमनकारी नीतियों के विरोध में केरल में अपने तरह का पहला सविनय अवज्ञा आंदोलन प्रारंभ हुआ। सत्ता का रुख और अधिक दमनकारी हो गया। सबसे पहले राज्य कांग्रेस के अध्यक्ष श्री पट्टम ए. थानु पिल्लई गिरफ्तार कर लिए गए।

और इस तह एक के बाद एक करके ग्यारह राज्य कांग्रेस के अध्यक्ष जेल में डाल दिये गए। ऐसा लगने लगा कि आंदोलन बिखर जाएगा। लेकिन गिरफ्तार होते समय कुट्टनाद रामकृष्ण पिल्लई ने अक्कमा को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था।

ऐसे कठिन माहौल में निडर और करिश्माई नेतृत्व क्षमता वाली अकम्मा चेरियन ने त्रावणकोर राज्य कांग्रेस की कमान संभाली। जेल में डाले गए नेताओं को रिहा कराने और त्रावणकोर में एक जिम्मेदार सरकार के लिए दीवान पर दबाव बनाने के लिए उन्होंने एक विशाल रैली का आयोजन किया।

कहा जाता है कि करीब 20,000 लोग विरोध प्रदर्शन में शामिल हुए। राज्य कांग्रेस पर प्रतिबंध खत्म करने और कांग्रेस नेताओं को रिहा करने की मांग को लेकर वे कोडियार राजमहल की ओर मार्च करने लगे। बहादुर अकम्मा इन प्रदर्शनकारियों का नेतृत्व कर रही थीं।


प्रसिद्ध लेखक ईएम कावूर ने उस ऐतिहासिक दृश्य का वर्णन करते हुए एक बार कहा था, ‘सैकड़ों नहीं, हजारों की संख्या में सफेद खद्दर जुबाह और सफेद टोपी पहने लोगों का समूह आगे बढ़ रहा था… अकम्मा चेरियन उस ‘सफेद समंदर’ का नेतृत्व कर रही थीं। वह एक खुली जीप में खद्दर और गांधी टोपी पहने खड़ी थीं

महल की तरफ प्रदर्शनकारियों को जाने से रोकने के लिए ब्रिटिश पुलिस अफसर ने जवानों को उन पर गोली चलाने का आदेश दिया।
यह आदेश सुनते ही, उस अफसर को ललकारते हुए अकम्मा ने कहा, ‘मैं इनकी नेता हूं, दूसरों को गोली मारने से पहले मुझे गोली मारो।’ उनके साहस ने पुलिस प्रशासन को अपना आदेश वापस लेने के लिए मजबूर कर दिया और एक बड़ा नरसंहार टल गया। देशभर के लोगों ने उनकी वीरता की प्रशंसा की और गांधी जी ने उन्हें ‘त्रावणकोर की झांसी रानी’ की उपाधि दी।

इसके बाद अकम्मा ने महिला स्वयंसेवी समूह, देससेविका संघ की स्थापना की और महिलाओं को स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल होने के लिए प्रेरित करना शुरू किया। अकम्मा को एक बड़ा खतरा मानते हुए अधिकारियों ने 24 दिसंबर 1939 को उनकी बहन रोसम्मा पुन्नोस (एक प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी) के साथ गिरफ्तार कर लिया और एक साल के लिए जेल में डाल दिया।


लेकिन रिहाई के बाद देश की आजादी के लिए मजबूत लड़ाई लड़ने से इस वीरांगना को कोई ताकत रोक नहीं सकी। उन्होंने ब्रिटिश हुकूमत को चुनौती देना जारी रखा और भारत छोड़ो आंदोलन का समर्थन करने के लिए उन्हें 1942 में फिर से गिरफ्तार कर लिया गया।

अक्कम्मा चेरियन स्वतंत्र भारत में जीवन

अंतत: 1947 में देश आजाद हुआ, लेकिन अकम्मा के लिए मिशन अभी खत्म नहीं हुआ था। त्रावणकोर का दीवान एक स्वतंत्र राज्य का सपना देख रहा था। ऐसे में अब अकम्मा ने त्रावणकोर को भारतीय संघ में मिलाने के लिए अपनी लड़ाई जारी रखी।

इन विरोध प्रदर्शनों के दौरान उन्हें गिरफ्तारियों का भी सामना करना पड़ा। उनकी देशभक्ति और संघर्ष ने उन्हें लोगों के बीच बेहद लोकप्रिय बना दिया था और वे त्रावणकोर विधानसभा के लिए निर्विरोध चुनी गया।

आजाद भारत मे अकम्मा ने समाज सुधार और शिक्षा के क्षेत्र में काम करना जारी रखा। वे उच्च नैतिक मूल्यों वाली महिला थीं, जिन्होंने हर तरह के अन्याय का विरोध किया। अपनी आत्मकथा जीविथम : ओरू समारम (जीवन : एक संघर्ष) की भूमिका में लिखा है –

‘शेक्सपियर ने कहा है कि दुनिया एक रंगमंच है और सभी पुरुष और महिलाएं केवल पात्र हैं; लेकिन मेरे लिए यह जीवन एक लंबा संघर्ष है – रूढ़िवाद, निरर्थक हो चुके रिवाज, सामाजिक अन्याय, लैंगिक भेदभाव के खिलाफ संघर्ष, जो कुछ अन्यायपूर्ण और बेईमान है उसके विरुद्ध संघर्ष….’ .जब मैं ऐसा कुछ देखती हूँ, तो मैं अंधी हो जाती हूँ, यहाँ तक कि मैं यह भी भूल जाती हूँ कि मैं किससे लड़ रही हूँ…!

मृत्यु और स्मारक

5 मई 1982 को अक्कम्मा चेरियन की मृत्यु हो गई। उनकी याद में वेल्लयांबलम, तिरुवनंतपुरम में उनकी एक प्रतिमा स्थापित की गई और एक पार्क भी बनाया गया। श्रीबाला के मेनन द्वारा उनके जीवन पर एक वृत्तचित्र फिल्म भी बनाई गई थी।

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