NCERT BOOK अध्याय 1 क्या , कब , कहाँ और कैसे ?

अतीत के बारे में हम क्या जान सकते हैं ?

अतीत के बारे में बहुत कुछ जाना जा सकता है – जैसे लोग क्या खाते थे , कैसे कपड़े पहनते थे , किस तरह के घरों में रहते थे ? हम आखेटकों ( शिकारियों) . पशुपालकों , कृषकों , शासकों , व्यापारियों , पुरोहितों , शिल्पकारों , कलाकारों , संगीतकारों या फिर वैज्ञानिकों के जीवन के बारे में जानकारियाँ हासिल कर सकते हैं ।

लोग कहाँ रहते थे ?

कई लाख वर्ष पहले से लोग नर्मदा नदी के तट पर रह रहे थे। यहां रहने वाले आरंभिक लोगों में से कुछ कुशल संग्राहक थे जो आस – पास के जंगलों की विशाल संपदा से परिचित थे । अपने भोजन के लिए वे जड़ों , फलों तथा जंगल के अन्य उत्पादों का यहीं से संग्रह किया करते थे । वे जानवरों का आखेट (शिकार) भी करते थे ।

कृषि

उत्तर – पश्चिम की सुलेमान और किरथर पहाड़ियों के क्षेत्र में कुछ ऐसे स्थान हैं जहाँ लगभग आठ हजार वर्ष पूर्व स्त्री – पुरुषों ने सबसे पहले गेहूँ तथा जौ जैसी फ़सलों को उपजाना आरंभ किया । उन्होंने भेड़ , बकरी और गाय – बैल जैसे पशुओं को पालतू बनाना शुरू किया ये लोग गाँवों में रहते थे ।

उत्तर – पूर्व में गारो तथा मध्य भारत में विध्य पहाड़ियों ये कुछ अन्य ऐसे क्षेत्र थे जहाँ कृषि का विकास हुआ । जहाँ सबसे पहले चावल उपजाया गया वे स्थान विंध्य के उत्तर में स्थित थे ।

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नगरों का विकास

सिंधु तथा इसकी सहायक नदियों के किनारे लगभग 4700 वर्ष पूर्व कुछ आरंभिक नगर फले – फूले । (सहायक नदियाँ उन्हें कहते हैं जो एक बड़ी नदी में मिल जाती हैं ) गंगा व इसकी सहायक नदियों के किनारे तथा समुद्र तटवर्ती इलाकों में नगरों का विकास लगभग 2500 वर्ष पूर्व हुआ ।

लोग यात्राएँ क्यों करते है

कभी लोग काम की तलाश में तो कभी प्राकृतिक आपदाओं के कारण एक स्थान से दूसरे स्थान जाया करते थे । कभी – कभी सेनाएँ दूसरे क्षेत्रों पर विजय हासिल करने के लिए जाती थीं ।

इसके अतिरिक्त व्यापारी कभी काफ़िले में तो कभी जहाजों में अपने साथ मूल्यवान वस्तुएँ लेकर एक स्थान से दूसरे स्थान जाते रहते थे ।

धार्मिक गुरू लोगों को शिक्षा और सलाह देते हुए एक गाँव से दूसरे गाँव तथा एक कसबे से दूसरे कसबे जाया करते थे । कुछ लोग नए और रोचक स्थानों को खोजने की चाह में उत्सुकतावश भी यात्रा किया करते थे ।

देश के नाम

अपने देश के लिए हम प्रायः इण्डिया तथा भारत जैसे नामों का प्रयोग करते हैं । इण्डिया शब्द इण्डस से निकला है जिसे संस्कृत में सिंधु कहा जाता है ।

लगभग 2500 वर्ष पूर्व उत्तर – पश्चिम की ओर से आने वाले ईरानियों और यूनानियों ने सिंधु को हिंदोस अथवा इंदोस और इस नदी के पूर्व में स्थित भूमि प्रदेश को इण्डिया कहा ।

भरत नाम का प्रयोग उत्तर – पश्चिम में रहने वाले लोगों के एक समूह के लिए किया जाता था ।

इस समूह का उल्लेव संस्कृत की आरंभिक ( लगभग 3500 वर्ष पुरानी ) कृति ऋग्वेद में भी मिलता है । बाद में इसका प्रयोग देश के लिए होने लगा ।

अतीत के बारे में कैसे जाने ?

अतीत की जानकारी हम कई तरह से प्राप्त कर सकते हैं । इनमें से एक तरीका अतीत में लिखी गई पुस्तकों को ढूँढना और पढ़ना है । ये पुस्तकें हाथ से लिखी होने के कारण पाण्डुलिपि कही जाती हैं ।

अंग्रेजी में ‘ पाण्डुलिपि ‘ के लिए प्रयुक्त होने वाला ‘ मैन्यूस्क्रिप्ट ‘ शब्द लैटिन शब्द ‘ मेनू ‘ जिसका अर्थ हाथ है , से निकला है ।

ये पाण्डुलिपियाँ प्राय : ताड़पत्रों अथवा हिमालय क्षेत्र में उगने वाले भूर्ज नामक पेड़ की छाल से विशेष तरीके से तैयार भोजपत्र पर लिखी मिलती हैं ।

ये पाण्डुलिपियाँ मंदिरों और विहारों में प्राप्त होती हैं । इन पुस्तकों में धार्मिक मान्यताओं व व्यवहारों , राजाओं के जीवन , औषधियों तथा विज्ञान आदि सभी प्रकार के विषयों की चर्चा मिलती है ।

इनके अतिरिक्त हमारे यहाँ महाकाव्य , कविताएँ तथा नाटक भी हैं । इनमें से कई संस्कृत में लिखे हुए मिलते हैं जबकि अन्य प्राकृत और तमिल में हैं ।

प्राकृत भाषा का प्रयोग आम लोग करते थे । हम अभिलेखों का भी अध्ययन कर सकते हैं । ऐसे लेख पत्थर अथवा धातु जैसी अपेक्षाकृत कठोर सतहों पर उत्कीर्ण किए गए मिलते हैं ।

इसके अतिरिक्त अन्य कई वस्तुएँ अतीत में बनीं और प्रयोग में लाई जाती थीं । ऐसी वस्तुओं का अध्ययन करने वाला व्यक्ति पुरातत्वविद् कहलाता है ।

पुरातत्त्वविद् पत्थर और ईट से बनी इमारतों के अवशेषों , चित्रों तथा मूर्तियों का अध्ययन करते हैं । वे औजारों , हथियारों , बर्तनों , आभूषणों तथा सिक्कों की प्राप्ति के लिए छान – बीन तथा खुदाई भी करते हैं ।

इनमें से कुछ वस्तुएँ पत्थर , पकी मिट्टी तथा कुछ धातु की बनी हो सकती हैं । ऐसे तत्त्व कठोर तथा जल्दी नष्ट न होने वाले होते हैं । पुरातत्त्वविद् जानवरों , चिड़ियों तथा मछलियों की हड्डियाँ भी ढूँढ़ते हैं । इससे उन्हें यह जानने में भी मदद मिलती है कि अतीत में लोग क्या खाते थे ।

class 6 history chapter 1 notes
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तिथियों का मतलब

वर्ष की यह गणना ईसाई धर्म – प्रवर्तक ईसा मसीह के जन्म की तिथि से की जाती है । अत : 2000 वर्ष कहने का तात्पर्य ईसा मसीह के जन्म के 2000 वर्ष के बाद से है । ईसा मसीह के जन्म के पूर्व की सभी तिथियाँ ई.पू. ( ईसा से पहले ) के रूप में जानी जाती हैं ।

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